(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Aadiparv (Mahabharat) - आदिपर्व (महाभारत)


॥ श्रीः ॥
1.52. अध्यायः 052
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Topics
अग्नौ सर्पपतनम्॥ 1 ॥
Mahabharata - Adi Parva - Chapter Text

सौतिरुवाच। 1-52-0x(251)(2173)
ततः कर्म प्रववृते सर्पसत्रविधानतः।
पर्यक्रामंश्च विदिवत्स्वे स्वे कर्मणि याजकाः॥ 1-52-1(2174)
प्रावृत्य कृष्णवासांसि धूम्रसंरक्तलोचनाः।
जुहुवुर्मन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम्॥ 1-52-2(2175)
कम्पयन्तश्च सर्वेषामुरगाणां मनांसि च।
सर्पानाजुहुवुस्तत्र सर्वानग्निमुखे तदा॥ 1-52-3(2176)
ततः सर्पाः समापेतुः प्रदीप्ते हव्यवाहने।
विचेष्टमानाः कृपणमाह्वयन्तः परस्परम्॥ 1-52-4(2177)
विस्फुरन्तः श्वसन्तश्च वेष्टयन्तः परस्परम्।
पुच्छैः शिरोभिश्च भृशं चित्रभानुं प्रपेदिरे॥ 1-52-5(2178)
श्वेताः कृष्णाश्च नीलाश्च स्थविराः शिशवस्तथा।
नदन्तो विविधान्नादान्पेतुर्दीप्ते विभावसौ॥ 1-52-6(2179)
क्रोशयोजनमात्रा हि गोकर्णस्य प्रमाणतः।
पतन्त्यजस्रं वेगेन वह्नावग्निमतां वर॥ 1-52-7(2180)
एवं शतसहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च।
अवशानि विनष्टानि पन्नगानां तु तत्र वै॥ 1-52-8(2181)
तुरगा इव तत्रान्ये हस्तिहस्ता इवापरे।
मत्ता इव च मातङ्गा महाकाया महाबलाः॥ 1-52-9(2182)
उच्चावचाश्च बहवो नानावर्णा विषोल्बणाः।
घोराश्च परिघप्रख्या दन्दशूका महाबलाः।
प्रपेतुरग्नावुरगा मातृवाग्दण्डपीडिताः॥ ॥ 1-52-10(2183)

इति श्रीमन्माहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ 52 ॥

Mahabharata - Adi Parva - Chapter Footnotes
1-52-1 पर्यक्रामन् पराक्रान्तवन्तः॥ 1-52-2 मन्त्रवन्मन्त्रयुक्तं यथा स्यात्तथा॥ 1-52-3 आजुहुवुः आहूतवन्तः॥ 1-52-5 चित्रभानुमग्निम्॥ 1-52-7 प्रमाणतः प्रमाणं प्राप्य॥ द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ 52 ॥


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